धर्म/अध्यात्म

काशी में महाशिवरात्रि मनाने की क्या है परंपरा, कैसे हुई शुरुआत?

महाशिवरात्रि के दिन सभी शिव भक्त भोलेनाथ की पूजा और व्रत करते हैं इस दिन रात्रि जागरण का विशेष महत्व है इसलिए इस दिन को महाशिवरात्रि कहा जाता है. वहीं भगवान शिव की नगरी काशी में महाशिवरात्रि का कुछ अलग ही रंग देखने को मिलता है. काशी को मोक्ष की नगरी भी कहा जाता है. मान्यता है कि यह शहर भगवान शिव के त्रिशूल पर टिका हुआ है और इस शहर पर भोलेनाथ की विशेष कृपा हैं. काशी में भगवान शिव के कई प्रसिद्ध मंदिर हैं. महाशिवरात्रि के दिन यहां कुछ विशेष कार्यक्रमों का आयोजन भी होता है.

काशी में कैसे मनाई जाती है महाशिवरात्रि?

काशी में भगवान शिव का कई प्रसिद्ध मंदिर हैं. जिसमे से एक काशी विश्वनाथ मंदिर भी है. यह मंदिर भगवान शिव के 12 ज्योतिर्लिंगों में से एक हैं. वाराणसी के मंदिरों में भगवान शिव को प्रसन्न करने के लिए दूध, दही, घी, शहद, जल आदि से अभिषेक किया जाता है. फिर मंगल आरती की जाती है जिसके बाद भक्तों के लिए मंदिर के कपाट खोल दिए जाते हैं. जिसके बाद शयन आरती तक कपाट खुले रहते हैं. इसके अलावा रात्रि के चार पहर शिवलिंग की पूजा की जाती है.

निकलती है शिव-बारात

कह जाता है कि फल्गुन मास की महाशिवरात्रि के दिन भगवान शिव और माता पार्वती का विवाह हुआ था, इसलिए शिवरात्रि के दिन काशी, उज्जैन वैद्यनाथ धाम समेत सभी ज्योतिर्लिंग मंदिर में शिव-बारात निकाली जाती है. जिसके लिए महाशिवरात्रि से कुछ दिन पहले ही मंदिरों में भगवान शिव और माता पार्वती के विवाह की तैयारी और रस्में जैसे तिलक, हल्दी मेहंदी आदि की रस्में शुरु हो जाती हैं.

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