बदल गया महंगाई मापने का तरीका: CPI की नई सीरीज आज से लागू, खाने-पीने की चीजों का वजन घटा; जानें आपकी जेब पर असर

देश में महंगाई मापने का तरीका बदलने जा रहा है. 12 फरवरी को कंज्यूमर प्राइस इंडेक्स (CPI) की नई सीरीज जारी होगी, जो यह तय करेगी कि आम आदमी की रोजमर्रा की जिंदगी में चीजें कितनी महंगी हो रही हैं. इस बार बदलाव सिर्फ आंकड़ों का नहीं है, बल्कि उस तरीके का है जिससे हमारी खपत को समझा जाता है. यही कारण है कि कुछ राज्यों को राहत मिल सकती है तो कुछ को महंगाई ज्यादा महसूस हो सकती है.
सबसे बड़ा बदलाव फूड यानी खाने-पीने की चीजों के वजन में हुआ है. पहले CPI की टोकरी में फूड का हिस्सा लगभग 46 प्रतिशत था, लेकिन नई सीरीज में यह घटकर करीब 37 प्रतिशत रह सकता है. इसका मतलब यह हुआ कि अब महंगाई के हेडलाइन आंकड़े में खाने की कीमतों का असर पहले जितना मजबूत नहीं रहेगा. यह बदलाव बढ़ती आय, लोगों की बदलती जीवनशैली और सेवाओं पर बढ़ते खर्च को दर्शाता है.
क्यों घटा फूड कैटेगरी का हिस्सा?
हालांकि, यहां एक अहम बात समझनी जरूरी है. फूड का हिस्सा सिर्फ इसलिए कम नहीं हुआ कि लोग कम खाना खा रहे हैं, बल्कि इसलिए भी कि मापने का तरीका बदला गया है. अब तैयार भोजन और स्नैक्स को फूड श्रेणी से निकालकर रेस्टोरेंट और कैफे सर्विसेज नाम की नई कैटेगरी में डाल दिया गया है. पहले यही खर्च फूड में शामिल था. इसलिए कागज पर फूड का वजन घटा हुआ दिखेगा, लेकिन असल खर्च इतना कम नहीं हुआ है.
नई टोकरी में तैयार भोजन और स्नैक्स का वजन लगभग 3 प्रतिशत से ज्यादा है. अगर इसे वापस फूड में जोड़ दिया जाए तो वास्तविक फूड हिस्सा करीब 40 प्रतिशत के आसपास बैठता है. यानी गिरावट जरूर है, लेकिन उतनी बड़ी नहीं जितनी पहली नजर में दिखाई देती है.
महंगाई पर कैसे पड़ेगा असर?
अब सवाल यह है कि इसका असर महंगाई पर कैसे पड़ेगा. अगर सब्जियां, अनाज या दालें महंगी होती हैं तो उनका प्रभाव अब कुल CPI पर थोड़ा कम दिखाई देगा. लेकिन अगर बाहर खाने, होटल या कैफे की कीमतें बढ़ती हैं तो वह सेवाओं की महंगाई के जरिए असर दिखाएंगी. यानी महंगाई का केंद्र धीरे-धीरे खाने से हटकर सेवाओं की तरफ शिफ्ट होता नजर आ सकता है.
किस राज्य में ज्यादा बढ़ेगी महंगाई?
राज्यों की बात करें तो केरल पर इसका असर खास नजर आ सकता है. वहां के लोगों की खर्च टोकरी में गैर-फूड चीजों का हिस्सा ज्यादा है. सेवाएं, स्वास्थ्य, शिक्षा, परिवहन, ईंधन, मकान किराया और लाइफस्टाइल से जुड़े खर्च वहां अधिक महत्व रखते हैं. केरल में गैर-फूड का वजन करीब दो तिहाई तक पहुंचता है, जो कई अन्य राज्यों से ज्यादा है. ऐसे में अगर सर्विसेज की कीमतें बढ़ती हैं तो राज्य में महंगाई ऊंची बनी रह सकती है, भले ही देश में फूड कीमतें नरम क्यों न हों.
केरल में सोने की मांग भी काफी अधिक है, क्योंकि वहां रेमिटेंस और सांस्कृतिक कारणों से सोना खरीदने की परंपरा मजबूत है. अगर सोने की कीमतों में तेजी आती है तो उसका असर राज्य की महंगाई पर ज्यादा दिख सकता है. इसी तरह नारियल और उससे जुड़े उत्पादों का महत्व भी अन्य राज्यों की तुलना में ज्यादा है. मौसम या अंतरराष्ट्रीय दामों में बदलाव का सीधा असर वहां महसूस हो सकता है. नई सीरीज में सोना और नारियल का संयुक्त वजन भी खासा अहम है, जिससे केरल और कुछ हद तक तेलंगाना जैसे राज्यों में महंगाई का पैटर्न अलग दिखाई दे सकता है.
यहां कम हो सकती है महंगाई?
इसके उलट बिहार जैसे राज्यों की स्थिति अलग हो सकती है. वहां अभी भी फूड का हिस्सा 50 प्रतिशत से ज्यादा है. अगर खाने-पीने की कीमतें स्थिर रहती हैं या गिरती हैं, तो वहां के महंगाई आंकड़े अपेक्षाकृत कम रह सकते हैं. हाल के महीनों में फूड कीमतों में नरमी का असर ऐसे राज्यों को राहत दे सकता है.
नई CPI सीरीज सिर्फ आंकड़ों का बदलाव नहीं है, बल्कि यह दिखाती है कि देश की खपत की तस्वीर बदल रही है. शहरों में बढ़ती सर्विस इकॉनमी, लाइफस्टाइल खर्च और सोने जैसी चीजों का असर अब महंगाई की गणना में ज्यादा दिखाई देगा. आम आदमी के लिए इसका मतलब यह है कि आगे चलकर महंगाई के आंकड़े थोड़ा अलग तरीके से समझने होंगे क्योंकि अब खेल सिर्फ रसोई का नहीं, बल्कि रेस्टोरेंट, अस्पताल, स्कूल तक फैल चुका है.




