धर्म/अध्यात्म

गोवर्धन लीला का रहस्य: आखिर भगवान श्रीकृष्ण ने ‘छोटी उंगली’ पर ही क्यों उठाया था विशाल पर्वत?

हिंदू धर्म में भगवान श्रीकृष्ण की लीलाएं न केवल मनमोहक हैं, बल्कि वे जीवन के गहरे सूत्र भी सिखाती हैं. इनमें से सबसे प्रभावशाली कथा ‘गोवर्धन धारण की है. जब नन्हे कान्हा ने विशाल गोवर्धन पर्वत को अपनी सबसे छोटी उंगली (कनिष्ठा) पर उठाकर देवराज इंद्र का अहंकार चूर कर दिया था. लेकिन क्या आपने कभी सोचा है कि भगवान ने पर्वत उठाने के लिए छोटी उंगली का ही चुनाव क्यों किया? आइए जानते हैं.

क्या है गोवर्धन लीला की कथा?

ब्रजवासी हर साल अच्छी वर्षा के लिए देवराज इंद्र की पूजा करते थे. बालक कृष्ण ने तर्क दिया कि इंद्र तो केवल अपना कर्तव्य निभा रहे हैं, जबकि असली पालनहार तो प्रकृति और गोवर्धन पर्वत हैं, जो पशुओं को चारा और हमें ऑक्सीजन देते हैं.कृष्ण की बात मानकर ब्रजवासियों ने इंद्र की जगह पर्वत की पूजा शुरू कर दी. इससे क्रोधित होकर इंद्र ने ब्रज पर मूसलाधार बारिश शुरू कर दी. तब ब्रजवासियों की रक्षा के लिए श्रीकृष्ण ने सात दिनों तक गोवर्धन पर्वत को अपनी उंगली पर उठाए रखा.

छोटी उंगली (कनिष्ठा) से पर्वत उठाने के 5 बड़े कारण

इंद्र का अहंकार चूर करना

इंद्र को अपनी शक्तियों पर बहुत घमंड था. श्रीकृष्ण यह बताना चाहते थे कि जिस पर्वत को इंद्र अपनी पूरी शक्ति से भी नहीं हिला सकते, उसे भगवान अपनी सबसे छोटी और कमजोर मानी जाने वाली उंगली से भी संभाल सकते हैं. यह शक्ति बनाम अहंकार की लड़ाई थी.

‘कनिष्ठा’ यानी समर्पण का प्रतीक

हस्तरेखा शास्त्र और अध्यात्म में छोटी उंगली को सबसे कम बलशाली माना जाता है. इसे उंगली पर धारण कर कृष्ण ने संदेश दिया कि जब हम पूरी तरह ईश्वर के प्रति समर्पित हो जाते हैं, तो वह हमारी रक्षा के लिए न्यूनतम प्रयास में भी बड़े से बड़ा संकट टाल देते हैं.

स्त्री शक्ति का सम्मान

पुराणों के अनुसार, कनिष्ठा उंगली को शक्ति और करुणा का प्रतीक माना गया है. कृष्ण ने इसी उंगली का उपयोग कर यह दर्शाया कि कोमलता में ही असली ताकत छिपी होती है.

उंगली का गोवर्धन से रिश्ता

माना जाता है कि हमारे हाथ की पांच उंगलियां पंचतत्वों (पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु और आकाश) का प्रतिनिधित्व करती हैं. छोटी उंगली जल तत्व से जुड़ी मानी जाती है. इंद्र (बारिश) के देवता थे, इसलिए कृष्ण ने जल तत्व वाली उंगली से ही इंद्र के प्रहार को रोक दिया.

गोपियों और ब्रजवासियों का प्रेम

एक सुंदर मान्यता यह भी है कि जब कृष्ण ने पर्वत उठाया, तो सभी गोप-ग्वालों ने अपनी लाठियां पर्वत के नीचे लगा दी थीं. उन्हें लगा कि पर्वत उनके बल से रुका है. कृष्ण ने छोटी उंगली का सहारा लेकर उन्हें यह महसूस होने दिया कि वे सब इस महान कार्य में उनके सहभागी हैं.

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