पहाड़ों की चढ़ाई में ‘फ्यूज’ हुआ हाइड्रोजन ट्रेन का सपना! कालका-शिमला ट्रैक पर क्यों फेल हुई रेलवे की महायोजना?

अंबाला। कालका-शिमला विश्व धरोहर सेक्शन पर हाइड्रोजन ट्रेन चलाने का बहुचर्चित प्रोजेक्ट फिलहाल ठंडे बस्ते में नजर आ रहा है। पर्यावरण के अनुकूल और आधुनिक तकनीक के तौर पर जिस परियोजना को पेश किया गया, वह तकनीकी संरचनात्मक और लागत जैसी अड़चनों में उलझकर आगे नहीं बढ़ सकी।
122 साल पुराने इस नैरोगेज हैरिटेज ट्रैक पर हाइड्रोजन ट्रेन चलाना व्यवहारिक ही नहीं हो पाया।पहाड़ों में हांफ गया रेलवे का जोश, विश्व धरोहर ट्रैक पर ग्रीन ट्रेन की उम्मीदें धुंधली, हाइड्रोजन ट्रेन का सपना कब होगा पूरा?
रेल मंत्रालय चाहता था कि साल 2023 के अंत तक ट्रेन चल पाए, लेकिन सर्वे के बाद इस प्रोजेक्ट की उम्मीदें ही धुंधली हो गईं। पहाड़ी क्षेत्र में तीखे मोड़, सीमित ढांचा और ऐतिहासिक सुरंगों में हाइड्रोजन ट्रेन को चलाना फिलहाल सपना ही नजर आ रहा है।
हाइड्रोजन ट्रेन का ही प्रोजेक्ट हरियाणा की झोली में आया है। सोनीपत से जींद के बीच में हाइड्रोजन ट्रेन चलानी है, जिसका सोनीपत में प्लांट लगाया जा चुका है, जबकि तारीख का इंतजार किया जा रहा है।
रेल मंत्रालय के आदेशों पर कालका-शिमला सेक्शन पर सर्वे ही नहीं हुआ बल्कि हाइड्रोजन प्लांट कहां पर लगेगा इसकी जगह चिह्नित की गई थी। बताया जाता है कि इस सेक्शन पर हाइड्रोजन ट्रेन के लिए ट्रैक, स्टेशन और इंफ्रास्ट्रक्चर में बड़े स्तर पर बदलाव होने की उम्मीदें थीं, जिसमें विश्व धरोहर का स्वरूप प्रभावित होने से इनकार नहीं किया जा सकता था। माना जा रहा है कि यूनेस्को के मानकों को ध्यान में रखते हुए यह प्रोजेक्ट अभी ठंडे बस्ते में है।
यह है कालका-शिमला सेक्शन
नौ नवंबर 1903 को कालका-शिमला रेल मार्ग की शुरूआत की गई थी। यह रेलमार्ग उत्तर रेलवे के अंबाला डिवीजन के तहत आता है। यह सेक्शन 96 किलोमीटर लंबे रेलमार्ग पर 18 स्टेशन हैं, जबकि इस सेक्शन में 103 सुरंगें हैं।




