अमेरिका के दबाव और चीन की धमकी के बीच फंसा भारत, जानें क्या है स्थिति

दुनिया की राजनीति और अर्थव्यवस्था अब एक नए मोड़ पर खड़ी है. अमेरिका और चीन, दो बड़े महाशक्ति देश अब वैश्विक सहयोग की दिशा और नियम तय कर रहे हैं. पहले की तरह यह सहयोग सभी देशों के बीच बराबरी पर नहीं, बल्कि इन दो ताकतों की शर्तों पर आधारित होता जा रहा है.
ग्लोबलाइजेशन का सपना टूटा?
90 के दशक के बाद जब दुनिया में व्यापार खुला और ‘वैश्वीकरण’ का दौर शुरू हुआ, तो माना गया कि इससे सब देशों को फायदा होगा. लेकिन हुआ उल्टा कुछ अमीर देश और उनके उद्योगपति और भी अमीर बन गए, जबकि गरीब देशों के श्रमिक और आम नागरिक पीछे छूट गए. शिक्षा, स्वास्थ्य और रोजगार की हालत बिगड़ती गई, लेकिन अमीरों के पास अरबों का मुनाफा बढ़ता गया.
तीन युगों की कहानी
औद्योगिक क्रांति के बाद से अब तक तीन बार वैश्विक सहयोग के दौर आए. पहला, जब यूरोपीय साम्राज्य जैसे ब्रिटेन ने अपने उपनिवेशों से कच्चा माल लिया और बदले में उन्हीं पर भारी टैक्स लगाए. दूसरा, शीत युद्ध के समय जब अमेरिका और सोवियत संघ ने अपने-अपने सहयोगी देशों का आर्थिक और सैन्य नेटवर्क बनाया. और तीसरा, शीत युद्ध के बाद, जब अमेरिका एकमात्र वैश्विक शक्ति बन गया और मुक्त व्यापार का प्रचार किया. लेकिन धीरे-धीरे अब यह तीसरा दौर खत्म हो रहा है और अमेरिका-चीन दोनों अपने हितों की रक्षा में लगे हैं.
भारत जैसी देशों के लिए कठिन फैसला
अब अमेरिका और चीन दोनों किसी देश से यह नहीं कह रहे कि वह उनके गुट में शामिल हो जाए, लेकिन दोनों की अपनी-अपनी शर्तें हैं. अमेरिका चाहता है कि भारत रूस से तेल न खरीदे और कुछ मुद्दों जैसे इजराइल या वीजा नीतियों पर चुप रहे. वहीं चीन चाहता है कि भारत सीमा विवाद या हिंद महासागर में उसके बढ़ते दबदबे पर ज्यादा न बोले. भारत जैसे देशों के लिए यह संतुलन बनाना बेहद कठिन हो गया है. उसे अपने हितों की रक्षा करते हुए दोनों महाशक्तियों के दबाव से भी बचना होगा.
भारत को क्या करना चाहिए?
इतिहास सिखाता है कि आर्थिक सहयोग हमेशा किसी न किसी शक्तिशाली देश के नियंत्रण में रहा है. आज भी वही हो रहा है बस नाम और तरीके बदल गए हैं. ऐसे में भारत को चाहिए कि वह अपने पुराने अनुभवों से सीखे और किसी एक शक्ति के अधीन न होकर अपनी स्वतंत्र नीति बनाए.




