भजन सुनने में मन न लगे तो समाधान, प्रेमानंद महाराज ने बताई राह

अध्यात्म की दुनिया में आज प्रेमानंद महाराज एक ऐसा नाम हैं, जिनके दर्शन और विचार करोड़ों लोगों का मार्गदर्शन कर रहे हैं. अक्सर भक्तों के मन में यह दुविधा रहती है कि वे विपरीत परिस्थितियों या सुख-सुविधाओं के अभाव में भगवान की भक्ति नहीं कर पा रहे हैं. हाल ही में एक भक्त ने महाराज जी से सवाल किया कि “मन कहता है कि अच्छी व्यवस्था होती तो भजन और अच्छा होता. इस दुविधा को दूर करते हुए प्रेमानंद महाराज ने जो जवाब दिया, वह किसी की भी आंखें खोलने के लिए काफी है.
असुविधा में ही जागता है सच्चा भाव
प्रेमानंद महाराज कहते हैं कि हमारा मन हमें अक्सर यह कहकर धोखा देता है कि सुख-सुविधाएं मिलने पर हम ज्यादा बेहतर तरीके से नाम जप या भजन कर पाएंगे. लेकिन हकीकत यह है कि जब व्यक्ति के पास अभाव होता है, तब उसका भगवान से जुड़ाव सबसे गहरा होता है.
जब किसी के पास केवल सूखी रोटी और सब्जी होती है, तो वह प्रभु को भोग लगाते समय रो पड़ता है कि ‘प्रभु, मैं गरीब हूं, मेरे पास आपको देने के लिए कुछ नहीं है.’ यही दीनता का भाव भगवान को सबसे प्रिय है.”
सुविधा और अहंकार का खतरा
प्रेमानंद महाराज के अनुसार, जब व्यक्ति के पास बहुत पैसा आ जाता है और वह भगवान को ‘छप्पन भोग’ लगाता है, तो अनजाने में मन में यह ‘गर्व’ आ जाता है कि “मैं इतना कुछ कर रहा हूँ.” भगवान छप्पन भोग के भूखे नहीं हैं, वे तो केवल भक्त का भाव देखते हैं. सुविधा अक्सर अहंकार को जन्म देती है, जो भक्ति के मार्ग में सबसे बड़ी बाधा है.
कहां हैं ईश्वर?
प्रेमानंद महाराज ने एक बहुत ही सुंदर जवाब दिया. जब कोई भक्त भूखा हो और अचानक उसे कोई भोजन दे जाए, तो उसे साक्षात ईश्वर का चमत्कार महसूस होता है. वहां भरोसा केवल भगवान पर होता है.
अमीर लोग कैसे करें सच्ची भक्ति?
प्रेमानंद महाराज ने संपन्न लोगों के लिए भी मार्ग बताया. उन्होंने कहा कि यदि आपके पास संपत्ति है, तो उसे अपना न समझें. गोस्वामी तुलसीदास जी के शब्दों का उल्लेख करते हुए उन्होंने कहा, नाथ सकल संपदा तुम्हारी, मैं सेवक समेत सुत नारी.” यानी व्यक्ति को स्वयं को संपत्ति का मालिक नहीं, बल्कि भगवान का सेवक समझना चाहिए.
जैसा अन्न, वैसा भजन
भोजन और भजन के संबंध पर उन्होंने एक कड़वा सच साझा किया. उन्होंने कहा कि जिसका भोजन जितना ज्यादा स्वादिष्ट और विलासी होगा, उसका भजन उतना ही स्वाद रहित (फीका) होगा. जो व्यक्ति रूखा-सूखा खाकर संतुष्ट रहता है, वह भगवान के चरणों में अधिक गहराई से उतर पाता है.भक्तों को सीख देते हुए प्रेमानंद महाराज ने कहा कि अपनी परिस्थिति बदलने की चिंता छोड़ दें. यदि आप आज विपरीत परिस्थितियों में भजन करना सीख गए, तो कल परिस्थिति सुधरने पर भी आप अपने मार्ग से कभी नहीं डगमगाएंगे. केवल ‘नाम जप’ पर ध्यान दें, व्यवस्था पर नहीं.




