उत्तर प्रदेश

Shahjahanpur Lat Sahab Holi: 300 साल पुरानी परंपरा, शाहजहाँपुर में क्यों निकलती है ‘लाट साहब’ की जूतों वाली होली?

उत्तर प्रदेश का शाहजहांपुर में राम प्रसाद बिस्मिल, अशफाक उल्ला ख़ां और ठाकुर रोशन सिंह की विरासत सांस लेती है. वहीं होली के दिन यही शहर एक ऐसी परंपरा का गवाह बनता है जिसे देखकर हर कोई हैरान रह जाता है. यहां रंग और गुलाल से नहीं बल्कि, जूते-चप्पलों से होली खेली जाती है. सुनकर थोड़ा हैरानी हो रही होगी लेकिन ये सही है. दरअसल, शाहजहांपुर की विश्व प्रसिद्ध लाट साहब परंपरा की जहां भैंसा गाड़ी पर बैठा एक शख्स हजारों लोगों के निशाने पर होता है. क्या है ये परंपरा? क्यों उड़ते हैं जूते? और क्यों पूरे देश में चर्चा का विषय रहती है शाहजहांपुर की ये अतरंगी होली?

होली की सुबह जब देश खुशी के रंगों में डूबा होता है, तब शाहजहांपुर की सड़कों पर इतिहास और आक्रोश साथ-साथ चलते नजर आते हैं. हजारों की भीड़ गालियों में नारों के बीच भैंसा गाड़ी पर बैठे लाट साहब पर जूते-चप्पल बरसाती है. यह कोई साधारण जुलूस नहीं है, बल्कि यह करीब 300 साल से भी ज्यादा पुरानी परंपरा है.

क्या है इतिहास?

वरिष्ठ इतिहासकार डॉ. एनसी मेहरोत्रा की पुस्तक के मुताबिक, इस परंपरा की शुरुआत 1746 में किले के आखिरी नवाब अब्दुल्ला खान के दौर से मानी जाती है. कहा जाता है कि होली के दिन नवाब किले से बाहर निकलते थे और उसी से शुरू हुआ नवाब साहब निकल आए का नारा. 1857 की क्रांति के बाद हालात बदले आक्रोश बढ़ा और 1859 की होली में नवाबों को बेइज्जत कर विरोध जताया गया. धीरे-धीरे समय के साथ यही विरोध आज के लाट साहब जुलूस में तब्दील हो गया.

पहले हाथी-घोड़ों पर जुलूस निकलता था, लेकिन आपत्तियों के बाद ऊंची सवारी पर रोक लगी और भैंसा गाड़ी पर नवाब साहब निकलने लगे. 1988 में तत्कालीन जिलाधिकारी कपिल देव ने नवाब का नाम बदलकर लाट साहब कर दिया. अंग्रेज गवर्नरों के प्रतीक के तौर पर आज भी लाट साहब को हेलमेट और बॉडी प्रोटेक्टर पहनाया जाता है और पूरे सुरक्षा घेरे में लगभग 8 किलोमीटर तक जुलूस निकाल कर शहर की सड़कों पर घुमाया जाता है.

 

जुलूस को लेकर प्रशासन अलर्ट

महानगर की चौक कोतवाली पर बड़े लाट साहब कोतवाल से सालभर का लेखा-जोखा मांगते हैं. बतौर नजराना नकद रकम और शराब की बोतल पेश की जाती है. इसके बाद प्रशासन जुलूस को अपने नियंत्रण में ले लेता है. ड्रोन कैमरे, PAC, रैपिड एक्शन फोर्स और चप्पे-चप्पे पर सुरक्षा के इंतजाम किए गए हैं. कहा जाता है कि शाहजहांपुर का यह जुलूस UPSC ट्रेनिंग मॉड्यूल में केस स्टडी के तौर पर शामिल किया गया है.

 

सिर्फ एक नहीं शहर के अलग-अलग इलाकों से बड़े लाट साहब और छोटे लाट साहब निकलते हैं. कहीं भैंसा गाड़ी तो कहीं गधे पर सवारी. जिले के खुदागंज कस्बे में तो ये सिलसिला रंग पंचमी तक चलता है. 2018 के बाद से नारों का रंग बदला है, लेकिन जूतों की तड़तड़ाहट आज भी कायम है.ये जुलूस गुलामी की मानसिकता पर चोट है या पुराने जख्म का मरहम? बहस हो सकती है, लेकिन इतना तय है लाट साहब की ये होली दुनिया में बेमिसाल है.

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