यूपी राजनीति: क्या सपा में आजम खान की कमी पूरी करेंगे नसीमुद्दीन सिद्दीकी? 150 सीटों पर प्रभाव और 2027 का मास्टरप्लान

उत्तर प्रदेश में कभी मायावती के करीबी रहे और हाल ही में कांग्रेस छोड़कर सपा में शामिल होने वाले नसीमुद्दीन सिद्दीकी बड़े मुस्लिम चेहरे में शुमार किए जाते हैं. सपा को आजम खान जैसे प्रमुख मुस्लिम चेहरे की अनुपस्थिति में पश्चिमी उत्तर प्रदेश और बुंदेलखंड के मुसलमानों के बीच मजबूत जमीनी नेता की जरूरत थी. नसीमुद्दीन शायद आजम की अनुपस्थिति को भर सकते हैं.
समाजवादी पार्टी में शामिल होते समय नसीमुद्दीन सिद्दीकी के साथ वेस्ट यूपी और बुंदेलखंड के करीब 50 से ज्यादा स्थानीय नेताओं ने भी सपा का दामन थामा है. ये सभी नेताओं की अपने-अपने इलाकों में मजबूत पकड़ मानी जाती है. माना जाता है कि ये सभी नेता नसीमुद्दीन के साथ बसपा के समय से हैं. हालांकि जब नसीमुद्दीन ने बसपा छोड़कर अपनी पार्टी बनाई तो ये सभी उन्हीं के साथ रहे. इसके बाद जब कांग्रेस मेें गए तो ये सभी नेता भी साथ हो लिए. इन नेताओं में वेस्ट यूपी के भी कुछ नेता शामिल हैं.
प्रदेश की 150 सीटों पर नसीमुद्दीन का प्रभाव
नसीमुद्दीन सिद्दीकी भले ही आजम खान की तरह मुस्लिम वोट बैंक में सर्वमान्य चेहरा न हों, लेकिन बुंदेलखंड और पश्चिमी यूपी में उनकी पकड़ किसी से छिपी नहीं है. समाजवादी पार्टी के सामने चुनौती बढ़ी हुई है. उनका इन क्षेत्रों में अच्छा प्रभाव है और वे कुशल रणनीतिकार माने जाते हैं. मायावती को मुस्लिमों के बीच लोकप्रिय बनाने में नसीमुद्दीन का बड़ा रोल माना जाता है. पहले बात करते हैं वेस्ट यूपी की. यहां के 16 जिलों में कुल 136 विधानसभा सीटें हैं. पश्चिमी यूपी की कुल विधानसभा सीटों में से करीब 30 से ज्यादा सीटें मुस्लिम बाहुल्य हैं. जबकि 20 से ज्यादा सीटों पर मुस्लिम अच्छी-खासी संख्या में मौजूद हैं. इन सीटों पर सपा को सबसे ज्यादा नुकसान बसपा ने पहुंचाया.
बसपा के वोट बैंक में लगाएंगे सेंध
अक्सर इन सीटों पर सपा-बसपा में टक्कर रहती है. इस बार सपा ने इसका तोड़ निकालते हुए नसीमुद्दीन को अपने पाले में किया है. इससे नसीमुद्दीन वेस्ट यूपी में बसपा के वोट बैंक में भारी सेंध भी लगा सकते हैं और पूरा मुस्लिम वोट सपा को दिला सकते हैं. नसीमुद्दीन को बसपा के कद्दावर नेता मुनकाद अली और शमशुद्दीन राईन का तोड़ भी माना जा रहा है. इसी तरह पुर्वांचल और बुंदेलखंड की 100 से ज्यादा सीटों पर नसीमुद्दीन का प्रभाव है. समय-समय पर वह अपनी उपयोगिता को साबित भी करते रहे हैं. उन्हें एक समय बसपा में मायावती के बाद दूसरा सबसे बड़ा नेता माना जाता था.
आजम की गैर-मौजूदगी में नसीमुद्दीन के पास खुला मैदान
आजम खान जेल में हैं. उनकी तबीयत भी ठीक नहीं रह रही है. ऐसे में चुनाव के समय तक उनके बाहर आने के बाद भी सपा को बड़ा फायदा नहीं होगा. उनकी गैर-मौजूदगी में नसीमुद्दीन के पास एक खुला मैदान है. वे अपनी बसपा शासनकाल वाली छवि को दोबारा वापस पा सकते हैं. नसीमुद्दीन ने कुछ ऐसा ही सोचकर समाजवादी पार्टी में ज्वाइन की है. बताया जा रहा है कि सपा अध्यक्ष अखिलेश यादव उन्हें PDA (पिछड़ा, दलित, अल्पसंख्यक) एजेंडे को मजबूत करने, संगठन विस्तार और 2027 विधानसभा चुनाव की रणनीति में महत्वपूर्ण भूमिका निभाने को दे सकते हैं. इतना ही नहीं चुनाव से पहले उन्हें पार्टी में भी बड़ा पद दिया जा सकता है.




