धर्म/अध्यात्म

मकर संक्रांति को क्यों कहते हैं मोक्ष का द्वार, जानें धार्मिक मान्यता

मकर संक्रांति का पर्व सनातन धर्म का बड़ा ही पावन पर्व है. इस दिन सूर्य देव मकर राशि में प्रवेश करते हैं और उत्तरायण हो जाते हैं. यही कारण है कि मकर संक्रांति को उत्तरायण भी कहा गया है. इसे देवताओं का काल माना जाता है. यही कारण है कि मकर संक्रांति के दिन स्नान-दान और जप-तप का विशेष महत्व बताया गया है. मकर संक्रांति या उत्तरायण वह समय माना जाता है जब ब्रह्मांड में सकारात्मक ऊर्जा बढ़ जाती है.

महाभारत के युद्ध के बीच, स्वयं भगवान श्री कृष्ण ने अर्जुन को दिए उपदेश में मकर संक्रांति या कहें कि उत्तरायण के समय की महिमा और इसके आध्यात्मिक महत्व में विस्तार से बताया था. श्रीमद्भगवद्गीता के आठवें अध्याय (अक्षरब्रह्म योग) में भगवान श्री कृष्ण मृत्यु के बाद आत्मा की गति के बारे में बताया है. ऐसे में आइए जानते हैं कि क्या इस समय पर मृत्यु होने से आत्मा को जन्म-मरण के चक्र से मुक्ति मिल जाती है?

मकर संक्रंति पर मृत्यु होने पर मिलता है मोक्ष

श्रीमद्भगवद्गीता में भगवान श्रीकृष्ण ने कहा है कि अग्नि, प्रकाश, दिन के समय, शुक्ल पक्ष और मकर संक्रांति या उत्तरायण के 6 महीनों में जिस व्यक्ति के प्राण निकलते हैं, उसको ब्रह्म (मोक्ष) प्राप्त होता है. इस समय पृथ्वी पर प्रकाश और चेतना का स्तर इतना ऊंचा होता है कि आत्मा जन्म-मरण के च्रक से मुक्त हो जाती है. इसका सबसे बड़ा उदाहरण महाभारत काल के भीष्म पितामह माने जाते हैं.

भीष्म पितामह की कहानी से समझें

भीष्म पितामह को इच्छा मृत्यु का वरादान मिला था. बाणों की शय्या पर लेटे हुए भीष्म पितामह ने कष्ट सहते रहने का फैसला किया, लेकिन प्राण नहीं त्यागे. उन्होंने मकर संक्रांति (उत्तरायण) के आने का इंतजार किया. क्योंकि उनको पता था कि इस शुभ काल में शरीर त्यागने पर मोक्ष की प्राप्ति होती है. शास्त्रों में कहा गया है कि उत्तरायण देवताओं का ‘दिन’ होता है और दक्षिणायन उनकी ‘रात्रि’.

सूर्य देव के मकर राशि की ओर बढ़ने पर देवताओं की सुबह होती है. यही वजह है कि इस दौरान किए गए दान, तप और जप का फल कई गुना प्राप्त होता है.

Related Articles

Back to top button